विकासनगर। रविवार को जनजाति क्षेत्र जौनसार बावर में पिनियात पर्व मनाया गया। स्थानीय लोक मान्यता के अनुसार क्षेत्र के पशु पालकों के पशुओं के साथ बुग्याल से सकुशल वापस लौटने पर मनाया जाता है। इसी के साथ इस दिन नई फसल के आने की खुशी भी मनाते हैं। उत्तराखंड में जनजाति वर्ग के पशुपालकों में छह माह बुग्याल में प्रवास का चलन काफी पुराना है। भोटिया पशुपालक अपने भेड़ बकरियों के साथ उच्च हिमालयी क्षेत्रों में प्रवास करते हैं, जबकि जनजाति क्षेत्र जौनसार बावर के पशुपालक पास के ही ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में बरसात के मौसम में अपने पशुओं के साथ प्रवास पर चले जाते हैं। हालांकि जौनसार बावर के पशुपालकों का प्रवास मात्र बरसात तक ही सीमित रहता है। बरसात समाप्त होते ही पशुपालक वापस अपने घरों, छानियों को लौट आते हैं।
बरसात के बाद पशुपालकों के पशुओं सहित सकुशल वापस लौटने की खुशी में स्थानीय स्तर पर पिनियात पर्व मनाया जाता है। इस पर्व की खासियत यह है इस दिन पूरे क्षेत्र में स्थानीय व्यंजन बनाए जाते हैं, जिनमे उलुवे और पिनुवे मुख्य व्यंजनों में शुमार रहते हैं। इन्हें कांसे की कटोरी में घी के साथ कांसे की थाली में परोसा जाता है। जिसके बाद पंचायती आंगनों में लोकनृत्य और लोकगीतों का दौर चलता है। स्थानीय सरदार सिंह चौहान, दिगंबर सिंह चौहान, जयपाल सिंह, जगदीश भारती, शोभाराम जोशी ने बताया कि किसी भी पर्व को मनाने का धार्मिक पहलू के साथ ही सामाजिक पहलू भी है। पिनियात को समाज में पशुओं के प्रति दया भाव रखने के साथ ही पशु और मानव के चोली दामन के संबंधों को इंगित करता है।

