देहरादून(संवाददाता,वि.सू)। उत्तराखंड राज्य में फ़र्ज़ी बीएएमस चिकित्सकों के पंजीकरण में भारतीय चिकित्सा परिषद के जिन तीन कार्मिको को संलिप्तता एवं कार्य में लापरवाही पर एसटीएफ़ द्वारा गिरफ़्तार किया गया था उन लोगों की न्यायिक अभिरक्षा रिमांड की अर्जी न्यायालय द्वारा ख़ारिज कर दी गई है व प्रकरण को जाँच के लिए एसएसपी देहरादून को प्रेषित किया है। ज्ञात हो कि उत्तराखंड राज्य में एक जानकारी मिली थी की कुछ चिकित्सक फ़र्ज़ी आयुर्वेदिक एवं यूनानी की डिग्री के आधार पर राज्य भर में फ़र्ज़ी चिकित्सालय संचालित कर रहे हैं और उन चिकित्सकों द्वारा उक्त डिग्री पूरे देश में फ़र्ज़ी डिग्री बाँटने वाले गिरोह द्वारा जारी की गई हैं,जिस पर प्रकरण की जाँच एसटीएफ़ को दी गई और एसटीएफ़ द्वारा मामले में जाँच कर थाना नेहरू कॉलोनी में ऐसे 36 संधिग्ध चिकित्सकों के विरुद्ध मुक़दमा पंजीकृत कराया गया था, साथ ही पश्चिम उत्तर प्रदेश में फ़र्ज़ी डिग्री बाँटने में सक्रिय सरग़ना इमलाख का नाम प्रकाश में आया जिसको एसटीएफ़ द्वारा गिरफ़्तार किया गया था, उससे पूछताछ में यह तथ्य प्रकाश में आया की उसके द्वारा कई लोगों को फ़र्ज़ी डिग्री मोटे पैसे लेकर दी हैं और ऐसे फ़र्ज़ी डिग्री धारी चिकित्सकों का राज्य की भारतीय चिकित्सा परिषद में पंजीकरण भी विभागीय कर्मचारियों की मदद से कराया था,जिससे विभागीय कर्मचारियों एवं तत्कालीन रजिस्ट्रार की संलिप्तता भी प्रकाश में आइ थी। एसटीएफ़ द्वारा उस समय कुछ कर्मचारियों को पहले पूछताछ के लिए बुलाया गया था और बाद में तीन कर्मचारियों पर भ्रष्टाचार अधिनियम की धारा बढ़ाकर गिरफ़्तारी कर ली गई थी। जिनको बाद में माननीय न्यायालय में पेश करने हेतु जब प्रस्तुत किया गया तो न्यायालय ने एसटीएफ़ द्वारा प्रस्तुत प्रपत्र ग़लत पाते हुए पुलिस का प्रार्थना पत्र निरस्त कर उनको मुक्त कर पुलिस की लचर कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह उठाए थे। पुलिस की लचर प्रणाली व कमजोर पैरवी से गिरफ़्तार फ़र्ज़ी चिकित्सक न्यायालय से जमानत पाने में भी सफल हो गए हैं। इसी बीच पुलिस की धीमी जाँच का लाभ उठाते हुए पूर्व रजिस्ट्रार बी॰डी॰ मैठानी को उच्च न्यायालय से गिरफ़्तारी पर राहत मिल गई है। पुलिस द्वारा इतने बड़े प्रकरण को हलके में लेने से फ़र्ज़ी चिकित्सकों को बढ़ावा मिला है और पूरा तंत्र इस मामले में फ़र्ज़ी चिकित्सकों पर अंकुश लगाने में नाकामयाब रहा है। इस प्रकरण में आयुष विभाग और मुख्य चिकित्सा अधिकारी की भूमिका भी संदेह के घेरे में है क्यूँकि इन चिकित्सकों के दस्तावेज़ों की समय-समय पर जाँच की ज़िम्मेदारी सम्बंधित विभाग की है। न जाने ऐसे फ़र्ज़ी चिकित्सकों द्वारा किए गए इलाज से कितने मरीज़ों की जान पर बन आइ होगी और न जाने किन अधिकारियों का आश्रय इन फ़र्ज़ी चिकित्सकों को था जो राजधानी देहरादून में सरे आम बड़े-बड़े इलाज में हाथ आजमॉ रहे थे। ऐसे में इस प्रकरण पर उच्च अधिकारियों व शासन की खामोशी समझ से परे है।
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